न्यायालय का पुलिस व्यवस्था सुधारने की दिशा में अहम निर्णय

न्यायालय का पुलिस व्यवस्था सुधारने की दिशा में अहम निर्णय

नई दिल्ली स्थित उच्चतम न्यायालय ने मंगलवार को अहम निर्णय सुनाया। न्यायालय ने पुलिस व्यवस्था सुधारने की दिशा में राज्यों को निर्देश दिये हैं कि कार्यवाहक पुलिस महानिदेशक न बनायें। राज्यों और केंद्र शासित राज्यों को आदेश दिया है कि वह डीजीपी उसी अफसर को बनायें, जिसका कार्यकाल दो साल से अधिक हो।

मुख्य न्यायाधीश दीपक मिश्रा की अध्यक्षता वाली पीठ ने सभी राज्यों को निर्देश दिया कि वे डीजीपी या पुलिस आयुक्त के पद पर नियुक्त किए जा सकने वाले संभावित उम्मीदवारों के रूप में सीनियर पुलिस अधिकारियों के नाम केंद्रीय लोक सेवा आयोग (यूपीएससी) को भेजें, साथ ही नियुक्ति के बाद डीजीपी का कार्यकाल कम से कम दो साल होना चाहिए।

दीपक मिश्रा की अध्यक्षता वाली खंडपीठ में न्यायाधीश एएम खानविलकर और न्यायाधीश डीवाई चंद्रचूड़ शामिल थे, जिन्होंने अपने आदेश में कहा कि राज्य की ओर से मिले नामों में से यूपीएससी तीन सबसे बेस्ट परफॉर्मेंस वाले अधिकारियों की सूची बनायेगी और राज्य उनमें से किसी भी एक को पुलिस प्रमुख नियुक्त करने को स्वतंत्र होंगे। न्यायालय ने यह भी कहा कि पुलिस अधिकारियों की नियुक्ति के संबंध में कोई नियम या, राज्य का कानून प्रभावी नहीं होगा।

उच्चतम न्यायालय ने उक्त आदेश केंद्र सरकार की याचिका पर दिये हैं। 2006 में उत्तर प्रदेश के पूर्व डीजीपी प्रकाश सिंह और सीबीआई के पूर्व ज्वाइंट डायरेक्टर एनके सिंह की जनहित याचिका पर पुलिस विभाग के नियमों में बदलाव के निर्देश दिए थे। केंद्र सरकार ने इनमें सुधार की मांग की थी, इसी पर मंगलवार को न्यायालय में सुनवाई की गई।

सुनवाई के दौरान अटॉर्नी जनरल केके वेणुगोपाल ने न्यायालय को बताया कि अधिकांश राज्य रिटायर होने की कगार पर पहुंचे अफसरों को कार्यकारी पुलिस महानिदेशक नियुक्त करते हैं, जिसे बाद में न्यायालयों के निर्देशों का हवाला देकर स्थाई कर दिया जाता है, इससे अधिकारी को दो साल और मिल जाते हैं, पांच राज्य तमिलनाडु, आंध्र प्रदेश, राजस्थान, तेलंगाना और कर्नाटक ने ही वर्ष- 2006 के न्यायालय के आदेश के अनुसार डीजीपी की नियुक्ति के लिए यूपीएससी से अनुमति ली, जबकि 25 राज्यों ने ऐसा नहीं किया।

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