राहु-केतु के चलते “भैया जी” के नहीं आ सकते “अच्छे दिन” बढ़ेगा हार का अंतर

राहु-केतु के चलते “भैया जी” के नहीं आ सकते “अच्छे दिन” बढ़ेगा हार का अंतर

बदायूं जिले में “भैया जी” के विरोधी बहुत ज्यादा नहीं हैं। “भैया जी” के व्यवहार से कोई दुखी नहीं है। “भैया जी” की सोच भी सकारात्मक ही है, वे लोगों की भलाई और क्षेत्र के विकास को लेकर सदैव चिंतित रहते हैं। “भैया जी” की कार्यप्रणाली से कुछेक लोग परेशान हो सकते हैं पर, ऐसे लोगों को “भैया जी” अपने व्यवहार से खुश कर लेते हैं। सवाल उठता है कि फिर चुनाव हारने के साथ “भैया जी” लगातार अलोकप्रिय क्यों हो रहे हैं?

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सवाल की तह में जाने का प्रयास किया। “भैया जी” के तमाम चाहने वालों से बात की तो, निचोड़ यही निकला कि “भैया जी” के पालतू राहु-केतु से अधिकांश लोग त्रस्त हैं। राहू-केतु की शर्त यह है कि “भैया जी” का खास वही हो सकता है, जो उनका खास है। अगर, कोई “भैया जी” को जान देने को भी तत्पर है पर, राहु-केतु से बात नहीं करता तो, राहु-केतु “भैया जी” के यहाँ भी उसकी एंट्री बंद करा देते हैं।

राहु-केतु की कार्यप्रणाली और व्यवहार से अधिकांश लोग त्रस्त हैं लेकिन, “भैया जी” राहु-केतु पर आंख बंद कर के विश्वास करते हैं, सो अधिकांश लोग “भैया जी” को चाह कर भी कुछ नहीं बता पाते। कुछेक साहसी लोग विद्रोह कर जाते हैं पर, वे राहु-केतु को निशाना नहीं बनाते। आक्रोशित लोग “भैया जी” पर ही हमला करते हैं, ऐसे आक्रोशित लोगों ने बताया कि राहु-केतु तो वेतनभोगी कर्मचारी हैं, उन से क्या मतलब, वे “भैया जी” के नौकर हैं, इसलिए उनसे नाराज होकर क्या होगा। “भैया जी” ने अपनी पूरी शक्ति राहु-केतु को सौंप रखी है, यह गलती “भैया जी” की है, इसलिए गुस्सा “भैया जी” पर ही आता है।

कुछेक आक्रोशित लोगों ने “भैया जी” को नाराज होने का कारण बताया भी था, इस पर “भैया जी” का कहना था कि मुझे इनसे बेहतर लोग दे दीजिये, मैं इन्हें हटा दूंगा मतलब, राहु-केतु को सुधारने को तैयार नहीं हुए “भैया जी, उनके कुकर्मों की दास्ताँ सुनने को तैयार नहीं हुए “भैया जी”, इसलिए नाराज लोगों ने “भैया जी” को चुनाव में सबक सिखा दिया लेकिन, उन लोगों का प्रेम “भैया जी” के प्रति आज भी है। चुनाव इस उम्मीद में हराया था कि “भैया जी” हारने के बाद समझ जायेंगे कि क्यों हारे हैं पर, “भैया जी” को राहु-केतु ने जो समझा दिया, वही समझे “भैया जी”, इसलिए हालातों में कोई सुधार नहीं हो पा रहा है।

चुनाव हारने के बाद “भैया जी” का आना कम हो गया है, जिससे अब पूरी की पूरी सत्ता राहु-केतु पर ही आ गई है। कोठी में “भैया जी” के चाहने वाले झाँक भी नहीं सकते अब। कोठी में राहु और केतु के ही चमचे जा सकते हैं। एक ओर हेडमास्टर की तरह कुर्सी लगा कर अपने चमचों के साथ राहु बैठ जाता है और दूसरी ओर केतु। पार्टी का नया सरदार भी राहु-केतु के बराबर नहीं बैठ सकता। करोड़ों की कोठी है, खर्चा “भैया जी” देते ही हैं, गुणगान करने वाले चमचे हैं, जो वाह-वाह करते रहते हैं, सो राहु-केतु आज भी सत्ता सुख भोग रहे हैं। दुःख-दर्द और बुराई “भैया जी” के हिस्से में हैं, जो वे झेल ही रहे हैं।

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हाल ही में सत्ता सुख भोगने की नीयत से “बहन जी” सत्ताधारी दल से टिकट पा गईं, इस पर कुछेक लोगों ने आश्चर्य व्यक्त किया, कुछेक लोग अवसर का लाभ उठाने की नीयत से बयानबाजी भी करते दिखाई दिए। राजनीति में एक बड़ी घटना हुई तो, उस पर क्रिया-प्रतिक्रिया आना स्वभाविक ही था, विरोधी भी हवा देते ही, ऐसे अवसर पर मौन धारण कर लेना चाहिए था। मौन भी हथियार होता है कभी-कभी, पर राहु-केतु ने “भैया जी” की नजर में अपने नंबर बढ़ाने के उद्देश्य से अंताक्षरी शुरू करा दी। राहु-केतु स्वयं ही यह बात फैलवाने लगे कि “भैया जी” की बहन जी सत्ताधारी दल में चली गई हैं, इससे लाभ हुआ या, हानि, इस पर “भैया जी” स्वयं ही मंथन करें अब।

खैर, जब सरकार थी तब राहु-केतु के चहेतों को जमकर टेंडर मिलते थे, हर स्तर पर मलाई मिलती थी। अब सरकार नहीं है पर, राहु-केतु के प्रत्येक चमचे को पद मिले हैं, जिससे सिद्ध हो जाता है कि राहु-केतु शक्तिशाली हैं। राहु की एक अराजनैतिक महिला मित्र तीन-चार सप्ताह पहले से ही क्षेत्र में अपने पोस्टर लगवा चुकी है कि वह पार्टी की प्रत्याशी है। प्रत्याशियों की सूची जारी हुई तो, वह प्रत्याशी थी, इस सबसे सिद्ध होता है कि राहु-केतु जो चाहते हैं, वही होता है, इसीलिए यह परंपरा बन गई है कि जो राहु-केतु की चमचागीरी करेगा, वह कर्मठ माना जायेगा और जो कर्मठ होते हुए भी राहु-केतु को दंडवत प्रणाम नहीं करेगा, उसे किनारे कर दिया जायेगा, इसीलिए सक्रिय लोग दूरी बना चुके हैं। जो अच्छे लोग बचे हैं, वे दूर जाने का मन बना चुके हैं।

“भैया जी” के चाहने वाले दुखी मन से यही कामना करते दिखाई देते हैं कि ईश्वर “भैया जी” को सद्बुद्धि दें। “भैया जी” को जिस दिन समझ आ गई, उसी दिन पुनः पहले की तरह लोकप्रिय हो जायेंगे, क्षेत्र में भ्रमण किये बिना चुनाव जीत जायेंगे। राहु-केतु के रहते “भैया जी” के अच्छे दिन आना संभव नहीं हैं। “भैया जी” चाहें जो कर लें पर, राहु-केतु के रहते वे अब कभी चुनाव जीत नहीं सकते। संपूर्ण शक्ति जुटा कर प्रयास करेंगे भी तो, अब हार का अंतर ही बढ़ेगा हर बार। सूत्रों का कहना है कि राहु-केतु के पास “भैया जी” का ऐसा कुछ है, जिसके चलते “भैया जी” चाह कर भी राहु-केतु से कुछ कह नहीं पाते, इसमें कितनी सच्चाई है, यह “भैया जी” जानें और राहु-केतु।

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