पाखंडी मठाधीश नहीं, प्राचीन संस्कृति वाले संत थे जयेंद्र सरस्वती

पाखंडी मठाधीश नहीं, प्राचीन संस्कृति वाले संत थे जयेंद्र सरस्वती

कांची कामकोटि पीठ के शंकराचार्य श्री श्री जयेंद्र सरस्वती का बुधवार सुबह निधन हो गया। मुंबईया फिल्मों की अभिनेत्री श्रीदेवी के निधन के कारण शंकराचार्य के निधन के संबंध में लोगों को अधिकांश जानकारी सोशल मीडिया से ही मिली। अधिकांश लोग पीठ और शंकराचार्य के बारे में जानने को उत्सुक नजर आ रहे हैं।

शंकराचार्य और पीठ के बारे में जाने बिना सब कुछ स्पष्ट समझ नहीं आयेगा, इसलिए पहले शंकराचार्य के बारे में बताते हैं। 788 ईसवी में शिवरत्न और सुभद्रा के यहाँ शंकर नाम के पुत्र का जन्म हुआ, यह बच्चा 6 वर्ष की आयु में प्रकांड विद्वान् बन गया और 8 वर्ष की आयु में सन्यास ग्रहण कर लिया, उस समय सनातनी परंपरा अपने सर्वाधिक बुरे दौर से गुजर रही थी। बौद्ध धर्म पूरी तरह छाया हुआ था, साथ ही अन्य तमाम धर्म भी निरंतर फैल रहे थे, यह सब मिल कर सनातनी परंपरा और संस्कृति को निरंतर समाप्त कर रहे थे तब, शंकर ने वैदिक धर्म को पुनर्स्थापित करने का संकल्प लिया और एक वेद के लिए एक पीठ स्थापित की, इस तरह उन्होंने पहली उत्तरामण्य मठ स्थापित की, जिसे उत्तर मठ, ज्योतिर्मठ और जोशीमठ के नाम से जाना जाता है, दूसरी पूर्वामण्य मठ, जिसे पूर्वी मठ, गोवर्धन मठ और पुरी के नाम से जाना जाता है, तीसरी दक्षिणामण्य मठ, इसे दक्षिणी मठ, शृंगेरी मठ, शारदा पीठ के नाम से जाना जाता है और चौथी पश्चिमामण्य मठ, जिसे पश्चिमी मठ, द्वारिका पीठ और द्वारिका पुरी के नाम से जाना जाता है, इन मठों के द्वारा वेदों का अध्ययन किया गया, उस ज्ञान को फैलाया गया और आताताईयों से संघर्ष के लिए योद्धा भी तैयार किये गये, जिनके अद्भुत प्रयास से सनातनी संस्कृति बच सकी, इसलिए शंकराचार्य को आदि शंकराचार्य, जगद्गुरु और अवतार के रूप में विशेष सम्मान दिया जाता है, इन पीठों के वरिष्ठतम संत को आदि शंकराचार्य का ही प्रतिनिधि मानते हुए जगद्गुरु और शंकराचार्य कहा जाता है, इनसे संबंधित और दीक्षित व्यक्ति ही संत माने जाते हैं, इनके अलावा जो भी पीठ हैं, वे अवैध हैं, उनके शंकराचार्य भी स्वयं-भू शंकराचार्य हैं, जैसे कल्कि पीठ, यह धार्मिक दृष्टि से अवैध है।

श्रृंगेरी मठ का महावाक्य अहं ब्रह्मास्मि है, जो यजुर्वेद के प्रचार-प्रसार को स्थापित की गई थी, इसके प्रथम मठाधीश आचार्य सुरेश्वरजी थे, वर्तमान में स्वामी भारती कृष्णतीर्थ 36वें मठाधीश हैं। गोवर्धन मठ का महावाक्य है प्रज्ञानं ब्रह्म, इसकी स्थापना ऋग्वेद के प्रचार-प्रसार को की गई थी, इसके प्रथम मठाधीश आदि शंकराचार्य के प्रथम शिष्य पद्मपाद हुए एवं वर्तमान में निश्चलानंद सरस्वती 145वें मठाधीश हैं। शारदा मठ का महावाक्य तत्त्वमसि है, इसकी स्थापना सामवेद के प्रचार-प्रसार को गई थी, इसके प्रथम मठाधीश हस्तामलक (पृथ्वीधर) थे एवं वर्तमान में स्वामी स्वरूपानन्द सरस्वती 79वें मठाधीश हैं। ज्योतिर्मठ का महावाक्य अयमात्मा ब्रह्म है, इसकी स्थापना अथर्ववेद के प्रचार-प्रसार के लिए की गई थी, इसके प्रथम मठाधीश आचार्य तोटक बनाए गए थे और वर्तमान में स्वामी वासुदेवानंद सरस्वती 44वें मठाधीश हैं, इन्हीं मठों से हिंदुओं की संत धारा निकलती है और इनके द्वारा दीक्षित संतों से ही गुरु मंत्र लेना चाहिए।

अब बात करते हैं कांची कामकोटि पीठ की तो, यह स्पष्ट है कि यह पीठ सनातनी संस्कृति को बचाने को स्थापित की गईं चार पीठों में से नहीं है लेकिन, कहा जाता है कि आदि शंकराचार्य ने अपने जीवन का अंतिम समय यहीं बिताया था, इसलिए इस स्थान को भी अन्य पीठों के जितना ही सम्मानित माना जाता है। हालाँकि कुछेक स्थानों पर यह भी कहा गया है कि आदि शंकराचार्य ने अपना शरीर केदारनाथ में त्यागा था। केदारनाथ के पुनर्निर्माण में कांची कामकोटि पीठ का महत्वपूर्ण योगदान रहा है, इसलिए इस तर्क को भी निरस्त नहीं किया जा सकता, अर्थात आदि शंकराचार्य के नाम से जुड़ी होने के कारण ही कांची कामिकोटि पीठ को भी विशिष्ट सम्मान मिलने लगा, यहाँ से भी धार्मिक गतिविधियों का संचालन होने लगा लेकिन, पीठ धर्म की सीमा में ही कार्य कर रही थी, जो समय के साथ रूढ़िवादी भी होती चली गई।

बी. पी. गौतम

बुधवार को शरीर त्याग चुके शंकराचार्य जयेंद्र सरस्वती को 22 मार्च 1954 को चंद्रशेखेंद्र सरस्वती स्वामीगल ने अपना उत्तराधिकारी घोषित किया था जब, उन पर पूर्ण रूप से मठ प्रमुख का दायित्व आया तो, उन्होंने रूढ़िवादी परंपराओं से मठ को बाहर निकालना शुरू कर दिया। धार्मिक और आध्यात्मिक कार्यों के बीच में ही उन्होंने सामाजिक कार्यों को बढ़ावा देना शुरू कर दिया, वे आंदोलन की तरह बढ़ावा देने लगे, पिछड़ों और दलितों को बराबरी देने लगे, कांचीपुरम और तमिलनाडु राज्य से बाहर निकाल कर उत्तर-पूर्वी राज्यों तक स्कूल और अस्पताल स्थापित करने लगे, इससे वे लोकप्रिय हुए, वहीं पीठ के अंदर के ही उनके कार्यों का विरोध होने लगा। विरोध के चलते वे एक बार 1980 में बिना बताये कांचीपुरम मठ छोड़कर कर्नाटक चले गए लेकिन, बाद में लौट गये और फिर दोगुने उत्साह से जुट गये, इस बीच 3 सितंबर, 2004 की कांची मठ के प्रबंधक शंकररमण की हत्या हो गई, जिसके आरोप में उन्हें 11 नवंबर, 2004 को गिरफ्तार किया गया, यह आरोप मठ की गुटबंदी के कारण ही उन पर लगा था तभी, पुदुचेरी कोर्ट ने 13 नवंबर, 2013 को उन्हें बरी कर दिया, इस प्रकरण में डीएमके ने धरना देकर शंकराचार्य के विरुद्ध सरकार पर दबाव बनाया था एवं इस प्रकरण में तत्कालीन मुख्यमंत्री जयललिता की भूमिका पर भी सवाल उठाये गये थे लेकिन, आरोप और गिरफ्तारी होने के बावजूद बहुत बड़े वर्ग का सम्मान का भाव जयेंद्र सरस्वती के प्रति नहीं बदला था, इसीलिए उनके निधन से अधिकांश लोग दुखी हैं।

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