बदायूं जनपद की दातागंज कोतवाली क्षेत्र के गांव वीरमपुर में 14 अगस्त की रात में शांति एवं उनकी बेटी जयंती की चाकू से गोद कर हत्या कर दी गई थी। दोहरे हत्याकांड में जयंती के भाई संजू सिंह ने वजीरगंज थाना क्षेत्र के गांव रोटा निवासी संजीव, पिंकू, सुरेंद्र सिंह, प्रदीप सिंह और कब्बाली के विरुद्ध नामजद एफआईआर दर्ज कराई थी। पुलिस ने हत्या कांड का प्रथम दृष्टया खुलासा कर दिया है लेकिन, विवेचना अभी जारी है।
विपिन ने मार दी मौसी और मौसेरी बहन
इस हत्या कांड का पुलिस ने खुलासा कर दिया है। रविवार दोपहर एसएसपी डॉ. बृजेश कुमार सिंह ने हत्या कांड का राजफाश करते हुये बताया कि 14 अगस्त की रात दातागंज कोतवाली क्षेत्र के गांव बीरमपुर में 70 वर्षीय शांति देवी और उनकी 35 वर्षीय बेटी जयंती की चाकू से गोदकर हत्या कर दी गई थी। पुलिस मौके पर पहुंची तो, वहां विपिन नाम का युवक घायल अवस्था में मिला था। विपिन ने ही घटना को अंजाम दिया। सगी मौसी और मौसेरी बहन की हत्या करने वाले विपिन के दो भाइयों का ने भी साक्ष्य मिटाने का प्रयास किया था। जिस चाकू से गोदकर हत्या की गई थी, उसे नजदीक के धान के खेत में फेंक दिया गया था और जयंती के दो मोबाइल छिपाने का प्रयास किया था, इसलिये विपिन के साथ दोनों भाइयों को भी गिरफ्तार कर लिया गया है। उन्होंने पूछताछ में बताया कि वह एक भाई की शादी कराने को जयंती से दो लाख रूपये उधार मांग रहे थे। जब उसने रुपये नहीं दिये तो, जयंती की हत्या कर दी। जब मौसी को पता चला तो, उनको भी मार डाला। आरोपित मूलरूप से हजरतपुर थाना क्षेत्र के गांव चितरी के निवासी हैं, तीनों भाई अपनी जमीन बेचकर बीरमपुर में मकान बनाकर रह रहे हैं।
हत्यारा नहीं, दरिंदा है विपिन
विपिन ने अपनी मौसी शांति और और मौसेरी बहन जयंती को बेरहमी से गोद दिया था। शांति के शरीर पर 22 और जयंती के शरीर पर 23 घाव निकले हैं, साथ ही विपिन की स्वयं की भी कलाई कट गई थी। विपिन के हाथ में भी तीन जगह चाकू लगा था।
पति के वंशजों ने अपने नाम दर्ज करा ली थी जमीन
जयंती की शादी वजीरगंज थाना क्षेत्र के गांव रोटा में हुई थी, उनके पति का निधन हो चुका है एवं उनके संतान भी नहीं है, जिससे वे अधिकांश समय अपनी के साथ मायके में ही बिताने लगी थीं, इस बीच उनकी जमीन, उनके पति के वंशजों ने अपने नाम दर्ज करा ली, जिनकी उन्हें भनक लगी तो, उन्होंने तहसील प्रशासन से शिकायत की, जिसके बाद जमीन पुनः उनके नाम पर दर्ज कर दी गई।
न्यायालय में सुनवाई से पहले ही हो गई हत्या
जयंती पति के उपचार में रूपये खर्च होने से और अपनी ही जमीन पुनः अपने नाम दर्ज कराने से आर्थिक संकट से जूझने लगी थीं, जिससे उन्हें अपनी जमीन का कुछ हिस्सा बेचा पड़ गया। जमीन बेचने की प्रक्रिया के दौरान कई वीडियो सामने आये हैं, जिनमें कुख्यात भू-माफिया राहुल वार्ष्णेय भी खड़ा दिखाई दे रहा है। जयंती ने हाल ही में बेची गई जमीन का दाखिल खारिज न करने का प्रार्थना पत्र तहसीलदार के न्यायालय में दिया था, जिसमें 18 अगस्त को सुनवाई होनी थी पर, इससे पहले ही 14 अगस्त की रात में हत्या कांड हो गया।
पूर्व राज्यमंत्री एवं विधायक के गुर्गे का नाम उछला
कस्बा वजीरगंज में राहुल वार्ष्णेय नाम का कुख्यात भू-माफिया है, जो पूर्व राज्यमंत्री एवं भाजपा विधायक महेश चंद्र गुप्ता का न सिर्फ करीबी है बल्कि, हाव-भाव और व्यवहार से लगता है कि राहुल वार्ष्णेय उनका नेता है, क्योंकि वे कहीं उद्घाटन करने जाते हैं तो, राहुल को बराबर खड़ा करते हैं। कहीं समर्थक स्वागत करते हैं तो, महेश चंद्र गुप्ता अपने गले से पहले राहुल के गले में माला डलवाते हैं, जिससे राहुल की पुलिस-प्रशासन में तू-ती बोलती है। एंटी भू-माफिया पोर्टल पर नाम दर्ज होने के बावजूद वो स्थानीय अफसरों पर दबाव बना कर, जो चाहता है, वही करा लेता है। जयंती ने मृत्यु से पहले कई प्रार्थना पत्र दिये थे, जिनमें राहुल वार्ष्णेय का नाम भी लिखा है, उन्होंने राहुल से अपनी जान को खतरा बताया था लेकिन, पुलिस-प्रशासन ने राहुल पर प्रभावी कार्रवाई नहीं की। जमीन संबंधी पूरे प्रकरण में राहुल की संलिप्तता स्पष्ट दिखाई दे रही है लेकिन, पुलिस-प्रशासन ने अभी तक न कोई कार्रवाई की है और न ही कोई बयान जारी किया है।
इन सवालों के चाहिये जवाब
- जयंती की जमीन हड़पने वाले गिरोह का सरगना कुख्यात भू-माफिया राहुल वार्ष्णेय था क्या?
- तहसील प्रशासन ने आनन-फानन में जयंती को बेदखल कुख्यात भू-माफिया राहुल वार्ष्णेय के दबाव में किया था क्या?
- जयंती की जमीन पर स्टे ऑर्डर कुख्यात भू-माफिया राहुल वार्ष्णेय के दबाव में दिया गया था क्या?
- मजबूरी में जमीन बेचते समय जयंती के आस-पास कुख्यात भू-माफिया राहुल वार्ष्णेय क्यों था?
- जयंती को जमीन बेचने के बावजूद पूरे रूपये नहीं मिले, उनके रूपये कौन हजम कर गया?
- जयंती कुख्यात भू-माफिया राहुल वार्ष्णेय से अपनी जान का खतरा क्यों बता रही थीं?
- जयंती के प्रार्थना पत्रों पर पुलिस ने प्रभावी कार्रवाई क्यों नहीं की थी?
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